سورج سر مژگاں ہے اندھیرے نہیں جاتے
ایسے تو کبھی چھوڑ کے بیٹے نہیں جاتے
تو جانب صحرائے عدم چل دیا تنہا
بچے تو گلی میں بھی اکیلے نہیں جاتے
جو پھول سجانا تھے مجھے تیری جبیں پر
بھیگی ہوئی مٹی پہ بکھیرے نہیں جاتے
اسلم کولسری یکم اگست 1946ء کو اوکاڑہ کے نواحی گاؤں کولسر میں پیدا ہوئے پھر جب یہاں فوجی چھاؤنی بنی تو ان کا گاؤں اس میں ضم ہو گیا، مگر یہ گاؤں ان میں اور ان کی شاعری میں جوں کا توں موجود رہا۔ انہوں نے اردو اور پنجابی دونوں زبانوں میں شاعری کی ہے۔ شاعری کی تمام مروجہ اصناف میں طبع آزمائی کی ہے کولسری کی شاعری کی ایک اہم خصوصیت اس کا سادہ ہونا ہے۔ ہمت اور کوشش سے اور خاص طور پر آرڈر پر تیار کر کے آرائشی الفاظ اور مشکل استعارے سے ان کی شاعری محفوظ ہے۔ ان کی شاعری عام مصالحوں مثلاََ شرابیں شرابوں میں ملیں کتابیں کتابوں میں ملیں اور درختوں پر نام وغیرہ سے پاک ہے۔ موخر الذکر استعاروں کا استعمال اپنی غیر تکمیل شدہ خواہشات کا اظہار تو ہو سکتا ہے مگر شاعری نہیں۔ صاف و سادہ زبان ، عام فہم شاعری، اپنی مٹی اور اپنے گاؤں سے محبت کولسری کی پہچان ہے۔ اسلم کولسری 7 نومبر 2016 کو لاہور میں انتقال کر گئے۔
اسلم کولسری کے چند منتخب اشعار
شہر میں آکر پڑھنے والے بھول گئے
کس کی ماں نے کتنا زیور بیچا تھا
آباد نگر میں رہتا تھا اور اجڑی غزلیں کہتا تھا
کچھ نام بھی شاید تھا اس کا یاد آیا اسلم کولسری
آنکھوں کے گل رنگ چمن میں اتری ہے برسات، غزل کی رات
آج تو جیسے قطروں میں تقسیم ہوئی ہے ذات، غزل کی رات
ہر صبح زندگی نئے اخبار کی طرح
میرے نحیف جسم کو دفتر میں پھینک دے
عید کا دن ہے سو کمرے میں پڑا ہوں اسلمؔ
اپنے دروازے کو باہر سے مقفل کر کے
تتلیوں کی جستجو میں گھر سے نکلا تھا مگر
جھاڑیوں میں اڑ رہی تھیں سنسناتی گولیاں
مسائل کے ابلتے پانیوں میں
جوانی کا جزیرہ جل رہا ہے
جوانی عارضی شے ہے جوانی
کسی مفلس کی بیماری نہیں ہے
رستے زخموں سے ڈھانپ رکھا ہے
جسم با ر قبا نہیں سہتا
دامان کوہسار میں اک جھیل دیکھ کر
جلتا ہو ا جہاز فضا میں ٹھہر گیا
مسئلوں کی جھاڑیوں میں پھنس گیا
خواہش دیدار کا زخمی ہرن
سارا پانی چھاگلوں سے آبلوں میں آ گیا
چلچلاتی دھوپ کے جلتے ہوئے اصرار پر
تیرے نام کی خوشبو شامل کر لیتا ہوں
خالی سانس تو سینے میں کنکر لگتا ہے
شرافت؟ میں نہیں سمجھا
پرانی بات ہے شاید
تارا سا بکھرتا ہے آکاش سے یا کوئی
ٹہھرے ہوئے آنسو کو کرتا ہے اشارہ سا
میں نے کرنوں سے نچوڑی تھی ذرا سی روشنی
اور میرے ہاتھ کیا حالات چھلنی ہو گئے
منصوبہ سفر ہی بڑا جاں گداز تھا
بیٹھے بٹھائے تھک کے ہوئے چوُرچوُر ہم
حسرتوں کی اداس بستی میں
مستعد مسئلوں کا پہرا ہے
ہاں اسی رستے پہ ہے شہر نگار آرزو
آپ چلتے جائیے میرے لہو کی دھار پر
ایک باسی نان کے ٹکڑے پہ آخر بک گئی
سانولی مالن کے تازہ پھول بکتے ہی نہ تھے
لاش کے پہلو سے چوری ہو گئے
ایک ٹوٹی سائیکل خالی ٹفن
اگر آپ کو اسلم کولسری کا کوئی شعر پسند آیا ہو تو ضرور پسندیدگی کا اظہار کیجئے گا۔
यहाँ आपके द्वारा साझा किए गए आलेख का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:
मिर्ज़ा ग़ालिब ने युवा ज़ैनुल आबिदीन आरिफ की मृत्यु पर जो अशआर (शेर) लिखे, उन्हें पढ़कर हर इंसान का दिल खून के आँसू रोता है। ऐसा ही उर्दू पाठकों के साथ उस समय फिर हुआ जब असलम कोलसरी का खूबसूरत बेटा लड़कपन में दुनिया से चल बसा। ये शेर लिखते समय उनकी क्या हालत होगी, यह बयान करना मुश्किल है। उनके इन शेरों को देखिए:
सूरज सर-ए-मिज़्गाँ है, अंधेरे नहीं जाते
ऐसे तो कभी छोड़ के बेटे नहीं जाते
तू जानिब-ए-सहरा-ए-अदम चल दिया तनहा
बच्चे तो गली में भी अकेले नहीं जाते
जो फूल सजाना थे मुझे तेरी जबीं पर
भीगी हुई मिट्टी पे बिखेरे नहीं जाते
असलम कोलसरी 1 अगस्त 1946 को ओकाड़ा के पास बसे गाँव कोलसर में पैदा हुए। फिर जब यहाँ सैन्य छावनी (कैंटोनमेंट) बनी तो उनका गाँव उसमें शामिल हो गया, मगर वह गाँव उनकी शख्सियत और उनकी شاعری में ज्यों का त्यों आबाद रहा। उन्होंने उर्दू और पंजाबी दोनों भाषाओं में شاعری की है और شاعری की सभी पारंपरिक विधाओं में طبعآزمائی (रचनात्मक प्रयास) की है। कोलसरी की शायरी की एक अहम विशेषता इसका सादा होना है। उन्होंने मेहनत और कोशिश से, और खास तौर पर बनावटी रूप से तैयार करके सजावटी शब्दों और कठिन प्रतीकों (इस्तआरों) से अपनी शायरी को सुरक्षित रखा है। उनकी शायरी आम घिसी-पिटी बातों जैसे "शराबें शराबों में मिलेंगी, किताबें किताबों में मिलेंगी" और "दरख्तों पर नाम" आदि से पूरी तरह पाक है। बाद वाले प्रतीक (इस्तआरे) भले ही अपनी अधूरी इच्छाओं का इजहार हो सकते हैं, मगर उन्हें सच्ची शायरी नहीं कहा जा सकता। साफ और सादी जुबान, आम فهم शायरी, अपनी मिट्टी और अपने गाँव से बेपनाह मोहब्बत ही असलम कोलसरी की असली पहचान है। असलम कोलसरी 7 नवंबर 2016 को लाहौर में इस दुनिया से रुखसत हो गए।
असलम कोलसरी के कुछ चुनिंदा अशआर
* शहर में आकर पढ़ने वाले भूल गए
किस की माँ ने कितना ज़ेवर बेचा था
* आबाद नगर में रहता था और उजड़ी गजलें कहता था
कुछ नाम भी शायद था उसका, याद आया असलम कोलसरी
* आँखों के गुल-रंग चमन में उतरी है बरसात, गजल की रात
आज तो जैसे कतरों में बंटी है जात, गजल की रात
* हर सुबह जिंदगी नए अखबार की तरह
मेरे نحیف (कमजोर) जिस्म को दफ्तर में फेंक दे
* ईद का दिन है, सो कमरे में पड़ा हूँ असलम
अपने दरवाजे को बाहर से मुकम्मल बंद करके
* तितलियों की तलाश में घर से निकला था मगर
झाड़ियों में उड़ रही थीं सर्सनाती गोलियाँ
* मसाइल के उबलते पानीियों में
जवानी का جزیرہ (ट्वीप) जल रहा है
* जवानी आरजी (अस्थाई) चीज है, जवानी
किसी मुफ्लिस की कोई बीमारी नहीं है
* रास्ते जख्मों से ढाँप रखे हैं
जिस्म बार-ए-قبا (बागे का बोझ) नहीं सहता
* दामान-ए-कोहसार में एक झील देखकर
जलकता हुआ जहाज फिज़ा में ठहर गया
* मसलों की झाड़ियों में फँस गया
ख्वाहिश-ए-दीदार का जख्मी हिरण
* सारा पानी छागलों से आबलों में आ गया
चलचलाती धूप के जलते हुए इसरार पर
* तेरे नाम की खुशबू शामिल कर लेता हूँ
खाली साँस तो सीने में कंकड़ लगता है
* शराफत? मैं नहीं समझा
पुरानी बात है शायद
* तारा सा बिखरता है आकाश से या कोई
ठहरे हुए आँसू को करता है इशारा सा
* मैंने किरणों से निचोड़ी थी जरा सी रोशनी
और मेरे हाथ क्या, हालात छलनी हो गए
* मंसूबा-ए-सफर ही बड़ा جاں گداز (जान लेने वाला) था
बैठे-बैठे थक के चूर-चूर हुए हम
* हसरतों की उदास बस्ती में
मुस्तैद मसलों का पहरा है
* हाँ इसी रस्ते पर है शहर-ए-निगार-ए-आरजू
आप चलते जाइए मेरे लहू की धार पर
* एक बासी नान के टुकड़े पे आखिर बिक गई
सानौली मालन के ताजा फूल बिकते ही न थे
* लाश के पहलू से चोरी हो गई
एक टूटी साइकिल, खाली टिफिन
अगर आपको असलम कोलसरी का कोई शेर पसंद आया हो तो अपनी राय का इजहार जरूर कीजिएगा।
लेखन एवं प्रस्तुति: प्रोफेसर अजहर हादिस
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